03 November 2013

Hazrat Waris Pak Reh.( Deva Sharif )



मनक़बत 

साहिबे मैखाना, पीकर तेरा पैमाना  |
सब होश गँवा बैठा, मै हो गया दीवाना ||

अब इतनी गुज़ारिश है, इकराम ये फरमाना |
या मुझको समो लेना, या मुझमे समा जाना ||

इस दिल के गुलिस्ताँ को, आबाद किया तुमने |
आते जो तुम इसमें, रह जाता ये वीराना ||

तन मन तो मै पहले ही, सब वार चुका तुमपे |
अब जान भी हाज़िर है, मकबूल हो नजराना ||

मै छोड़ के अब तुमको, जाऊं तो कहाँ जाऊ |
तुमसे ही शनासा हूँ, दुनिया से हूँ बेगाना ||

आकर तेरी चौखट पर, मै हो गया शैदाई |
देखा जो तेरा मैंने , अंदाज़े करीमना ||

अब आँख मिचौली का, मै खेल खेलूँगा |
लो ढूँढ लिया तुमको, अब मत कहीं छुप जाना ||

अरमान  यही दिल में, रखता है 'हिलाल' अपने |
नज़रों से पिलाकर कर तुम, कर दो इसे मस्ताना || 

No comments:

Post a Comment